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पढ़ो ऐसे कि जैसे तुम्हें सदा जीना है,

जियो ऐसे कि जैसे तुम्हें आज ही दुनिया से चले जाना है…

कालिदास ओ कालिदास-(कविता)-बाबा नागार्जुन

कालिदास ओ कालिदासकालिदास ओ कालिदासकालिदास ओ कालिदासकालिदास! सच-सच बतलानाइन्दुमती के मृत्युशोक सेअज रोया या तुम रोये थे?कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख सेनिकली हुई महाज्वाला मेंघृत-मिश्रित सूखी समिधा-समकामदेव जब भस्म हो गयारति का क्रंदन सुन आँसू सेतुमने ही तो दृग धोये थेकालिदास! सच-सच बतलानारति रोयी या तुम रोये थे? वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिकाप्रथमContinue reading “कालिदास ओ कालिदास-(कविता)-बाबा नागार्जुन”

धूप मीठी लगी

तुम्हें चलते हुए देखा, उस रोज दोपहर में, और छा गय़ी शांति, मेरे सारे शहर में।केवल जो बातें बोलीं तुमने, वह ही मुझे खट्टी लगीं,उस रोज दोपहर की,धूप मीठी लगी। सतरंगी परिधान में थी, तुम मानो आसमान में थी, नेत्रों में मैं डूब गया, पाया नहीं तुम्हें,यूँ लगा स्वयं के ही ध्यान में थींकेवल वहContinue reading “धूप मीठी लगी”

बस इस सदी की ही बात है

बस इस सदी की ही बात है,फिर ये पंछी चहचहाएंगे नहीं,करना कोशिशें लाख मनाने की,वे तुमसे मिलने आएंगे नहीं। बस इस सदी की ही बात है,उलझा लो पतंगों को पेड़ पर, बाद में वे तुम्हें रुलाएंगे नहीं,और, रक्षा सूत्र भी कलाई पर बँधाएंगे नहीं। बस इस सदी की ही बात है,जलमग्न नहीं, अश्रुमग्न संसार होContinue reading “बस इस सदी की ही बात है”

प्रेम(LOVE)

एक बार की बात है, एक पक्षी था। वह दो श्रेष्ठ पंख थे, आलीशान, रंगीन और बेहतरीन परों से सजे हुए। संक्षेप में, वह एक ऐसा जीव था जो आकाश में स्वतंत्र रूप से उड़ने के लिए बना था, जो भी उसे देखता प्रसन्नता से भर उठता। एक दिन, एक औरत ने उस पक्षी कोContinue reading “प्रेम(LOVE)”

गर प्रसिद्धी पानी है तो…

तुम्हें गर प्रसिद्धी पानी है तो, राजनीतिक मसलों पर बोलो। अपनी बात रखो, चाहे जबरदस्ती,हो सके तो इनको नापो तोलो। एक बात कहकर उसे भूल जाने का, अभ्यास करते रहो निरंतर। सिखलाओ तुम ना आता हो तब भी, नैतिक, अनैतिक का अन्तर। वह ‘धी’ बनो जो और प्रचंड करती आग को, सर्पों का दिन होContinue reading “गर प्रसिद्धी पानी है तो…”

अब डर नहीं है…(There is no fear now)

चाँद-तारों के खो जाने का डर नहीं है,मुझे सूरज के उतर आने का डर नहीं है,यह लम्हा गुजरना ही है, गुजर जाएगा,मुझे इसके गुजर जाने का डर नहीं है।उस पर अधिकार नहीं, उसकी भी सत्ता है,मुझे उसके मुकर जाने का डर नहीं हैअनेक ख्यालों से इतना गुजर चुका,अब कोई ख्याल आने का डर नहीं हैस्वयंContinue reading “अब डर नहीं है…(There is no fear now)”

पास में बैठो, मोहब्बत की महक देते रहो- POEM BY SATYAPAL SATYAM

पास में बैठो, मोहब्बत की महक देते रहो ,किसी अंधेरे में इन आँखों को चमक देते रहो। धूप में झुलसे ना मेरी प्रीत की हरियालियाँ सूख ना जाये कहीं, तरुवर की गीली डालियाँ सींचते जाओ टहनियों को, लचक देते रहो। पास में बैठो मोहब्बत की महक देते रहो, किसी अंधेरे में इन आँखों को चमक देते रहो। नफ़रतों केContinue reading “पास में बैठो, मोहब्बत की महक देते रहो- POEM BY SATYAPAL SATYAM”

केवल तुक मिलाए-2

केवल तुक मिलाए-1 कलम की स्याही सघन है, रुक-रुक के चलती पवन है, हर शुरुआत अ-धुरी रही है, खुद से मेरी बहुत दूरी रही है। दिशाएँ सब धुँधली हैं, आकाश में अब भी बदली हैं, दिन तो हो गया है, ‘दिनकर’ छिपा हुआ है। दीवार की ओट में छिपकर बैठा है, वहाँ कोई और नहीं,Continue reading “केवल तुक मिलाए-2”

और, फिर एक यहाँ से कविता निकलेगी

चाँद का आकार दिनोंदिन बदलता जा रहा है, सूरज का स्वभाव भी परवान चढ़ता जा रहा है, रोशनी इधर-उधर बादलों की इच्छा से टहलेगी, और, फिर एक यहाँ से कविता निकलेगी। सत्ताधीश हों या बंजारे यहाँ, भूख दोनों की बढ़ती जाएगी, एक जीवन की ही आस, अब रेत की तरह फिसलती जाएगी, हवा तूफान बनContinue reading “और, फिर एक यहाँ से कविता निकलेगी”

अंतराल

कई दिनों बाद आया है,एक अंतराल।मानो निकलेगा, कोई गहन उजाला,जैसे फैलती, ज्वालामुखी की ज्वाला।हो जाएंगे राख, इधर-उधर,फैले हुए, ठहराव या कंकड-पत्थर।कितना समय माँगेगा मुझसे,यह अंतराल,और कितना मैं दे पाऊंगा इसे,किसी अज्ञात समय, जरूर होगा,समाप्त, यह अंतराल।

सावधान! बच्चे उतर रहे हैं

सावधान! बच्चे उतर रहे हैं। सजग तो मैं हूँ ही, लेकिन चलती जा रही इस बस से, केवल वायु के तीव्र झोंके लड़ रहे हैं। बच्चे कहाँ उतर रहे हैं? अंधा मैं हो गया हूँ, या, इतनी प्रगति तुमने पा ली, कि बच्चे अदृश्य फिर रहे हैं!बच्चे कहाँ उतर रहे हैं? सैकड़ोंं दफा रुका, देखकर,Continue reading “सावधान! बच्चे उतर रहे हैं”

लक्ष्य(कविता)- अमृता प्रीतम

वो बेटा था बड़ी उलझनें थी विकल्प जो इतने थे जैसे डॉक्टर इंजीनियर साइंटिस्ट इत्यादि और वो बेटी थी कोई उलझन नहीं थी क्योंकि कोई विकल्प ही नहीं था बस लक्ष्य था एकमात्र अच्छा वर।

PREDICTION OF CORONA VIRUS YEARS BEFORE (in Hindi)

आइए आपको उन दो किताबों के बारे में बताते हैं, जिनमें आज चीन के वुहान प्रांत से फैलकर पूरी दुनिया में पहुँचे कोरोनावायरस के बारे में बताया गया था। पहली किताब 1981 में पब्लिश हुई थी, किताब का नाम था “The Eyes of Darkness”, इसमें लेखक ने लिखा है सन 2020 में वुहान-400 नाम का एक वायरस वुहानContinue reading “PREDICTION OF CORONA VIRUS YEARS BEFORE (in Hindi)”

कितनी माताएँ?- Akbar Birbal Story

एक बार अकबर-बीरबल हमेशा की तरह टहलने जा रहे थे। रास्ते में एक तुलसी का पौधा दिखा तो मंत्री बीरबल ने झुककर प्रणाम किया। अकबर ने पूछा- कौन है ये? बीरबल- ये मेरी माता हैं। अकबर ने तुलसी के झाड़ को उखाड़कर फेंक दिया और बोला- ‘कितनी माता हैं तुम लोगों की?’ बीरबल को उसकाContinue reading “कितनी माताएँ?- Akbar Birbal Story”

‘शिक्षा’-आदम की डायरी(‘अज्ञेय’ का कहानी संचयन)

गुरु थोड़ी देर चुपचाप वत्सल दृष्टि में नवागन्तुक की ओर देखते रहे। फिर उन्होंने मृदु स्वर में कहा, ‘‘वत्स, तुम मेरे पास आये हो, इसे मैं तुम्हारी कृपा ही मानता हूँ। जिनके द्वारा तुम भेजे गये हो उनका तो मुझ पर अनुग्रह है ही कि उन्होंने मुझे इस योग्य समझा कि मैं तुम्हें कुछ सिखाContinue reading “‘शिक्षा’-आदम की डायरी(‘अज्ञेय’ का कहानी संचयन)”

प्रेरणादायी कहानियाँ-3 –संघर्ष आवश्यक है।

जीव विज्ञान के एक अध्यापक अपने शिष्यों को पढ़ा रहे थे कि सूँड़ी तितली में कैसे बदल जाती है। उन्होंने छात्रों को बताया कि कुछ ही घंटों में तितली अपने खोल से बाहर निकलने की कोशिश करेगी। उन्होंने छात्रों को आगाह किया कि वे खोल से बाहर निकलने में तितली की मदद न करें। इतनाContinue reading “प्रेरणादायी कहानियाँ-3 –संघर्ष आवश्यक है।”

खोजना होगा, तो खोज ही लूंगा…

खोजना होगा तो खोज ही लूंगा,चाहे कितनी परतों में छिपा हो,कोई मेरा, या सबका वह।चलना होगा तो चल ही लूंगा,चाहे कितने ही पत्थर वजह,बनें मेरे रक्त के बहने की।देखना होगा तो देख ही लूंगा,चाहे प्रकाश विलीन हो जाए कहीं,और तम का ही हो क्षितिज।जानना होगा तो जान ही लूंगा,चाहे दोहराव करना पड़े जीवन का।और मिलनाContinue reading “खोजना होगा, तो खोज ही लूंगा…”

कोरोना ! तुम क्यों आए भारत में?

कोरोना ! तुम क्यों आए भारत में?वह भी होली के समय!तुम्हें पता नहीं यहाँ रंग उड़ता है!और यहाँ के लोग रंग से अधिक,अब ये लोग तुमसे भी कहेंगे,‘बुरा ना मानो होली है,’पर तुम तो ठहरे परदेसी,‘बुरा तो मान जाओगे’खैर, अब तुम्हें जाना होगा,वहाँ, जहाँ सब अंतत जाते हैंयहाँ रहे तो ऐसी-वैसी हरकतें करोगेक्योंकि पेय भाँगContinue reading “कोरोना ! तुम क्यों आए भारत में?”

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो

“क्या कहती हो ठहरो नारी!संकल्प अश्रु-जल-से-अपने।तुम दान कर चुकी पहले हीजीवन के सोने-से सपने। नारी! तुम केवल श्रद्धा होविश्वास-रजत-नग पगतल में।पीयूष-स्रोत-सी बहा करोजीवन के सुंदर समतल में। देवों की विजय, दानवों कीहारों का होता-युद्ध रहा।संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवितरह नित्य-विरूद्ध रहा। आँसू से भींगे अंचल परमन का सब कुछ रखना होगा-तुमको अपनी स्मित रेखा सेयहContinue reading “नारी! तुम केवल श्रद्धा हो”

‘जल’ तुम भी न

‘जल’ तुम भी न किसी को ‘जलाते’ भी नहीं व्यर्थ अपना नाम ‘जल’ रख रखा है। तभी तो तुम्हारे होने का, मैंने अपने मन में शक रखा है।

मैं भाव सूची- poem by KUMAR Vishwas

मैं भाव सूची उन भावों की जो बिक़े सदा ही बिन तोले,तन्हाई हूँ हर उस ख़त की,जो पढ़ा गया है बिन खोले।हर आंसू को हर पत्थर तक पहुँचाने की लाचार हूक,मैं सहज अर्थ उन शब्दों का,जो सुने गए हैं बिन बोले,जो कभी नहीं बरसा खुल कर,हर उस बादल का पानी हूँ। लव-कुश की पीर बिनाContinue reading “मैं भाव सूची- poem by KUMAR Vishwas”

उड़ने वाली झाडू

झाडू है एक मेरे घर में, लेकिन उड़ने वाली नहीं, यह मुझे पता चला तब उस समय जब की कोशिश, झाडू से पहली बार उड़ने की, हाँ, उड़ा मैं, कुछ क्षणों तक तो कि क्या पता, इंजन खराब हुआ या फ्यूल गुल हो गया! इससे पहले कुछ समझ पाता, मैं प्यारी धरती से जा मिला।

तुम आईं(कविता)- केदारनाथ सिंह

तुम आईंजैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रसजैसे चलते-चलते एड़ी मेंकांटा जाए धंसतुम दिखींजैसे कोई बच्चा सुन रहा हो कहानीतुम हंसीं जैसे तट पर बजता हो पानीतुम हिलींजैसे हिलती है पत्तीजैसे लालटेन के शीशे में काँपती हो बत्तीतुमने छुआजैसे धूप में धीरे-धीरे उड़ता है भुआ और अंत में जैसे हवा पकाती है गेहूं के खेतोंContinue reading “तुम आईं(कविता)- केदारनाथ सिंह”

TIC TAC TOE

चार लकीरें,और, खेल तैयार। दो खिलाड़ी, और, खेल शुरु,दो हारे हुए चिह्न, कुछ चालें, और, खेल समाप्त।

‘जब मैंने पहली निजी पुस्तक ख़रीदी’ -डॉ. धर्मवीर भारती

लाइब्रेरी खुलते ही पहुँच जाता और जब लाइब्रेरियन शुक्ल जी कहते कि बच्चा अब उठो, पुस्तकालय बन्द करना है तब बड़ी अनिच्छा से उठता। जिस दिन कोई उपन्यास अधूरा छूट जाता, उस दिन मन में कसक होती कि काश इतने पैसे होते कि सदस्य बन कर किताब ईश्यू करा लाता, या काश इस किताब कोContinue reading “‘जब मैंने पहली निजी पुस्तक ख़रीदी’ -डॉ. धर्मवीर भारती”

हाशिए खिंचते रहते हैं

हाशिए खिंचते रहते हैं, मेरे कागज घिरते रहते हैं, हर क्षण बदलते पाता हूँ, खुद को और अपने शब्दों को कुछ शब्द समान रहते हैं, जैसे सब एक ही आसमान कहते हैं गुत्थियाँ सुलझती रहती हैं, अधिकतर तो उलझती रहती हैं, कहानियों का कहाँ अंत है? इनकी यात्रा तो शायद अनंत है! हाशिए टेढ़े-मेढ़े होतेContinue reading “हाशिए खिंचते रहते हैं”

कुछ प्रश्न

‘काला’ होता है आखिरकितना ‘काला’?‘गोरा’ आखिर होता हैकितना ‘गोरा’?‘पूरा’ कितना ‘पूरा’ होता है?कितने ‘अँधेरे’ में ‘अँधेरे’ को रहना पड़ता है?कितनी ‘ऊँचाई’ पर ‘ऊँचे’ को चढ़ना होता है?किस क्षण कह दें हमकि ‘सवेरा हो गया?’किस पल बुझा दें हम,सब रोशनी सोने के लिये?क्या है ऐसा किताबों में,जो पढ़ नहीं सकते?आखिर किस कहानी को हम,मन में गढ़Continue reading “कुछ प्रश्न”

चींटी की ‘राह’

फिर रोकी राह उसकी,कहा- ‘यहाँ से नहीं’दूसरे छोर पहुँची, तो भीकहा- ‘यहाँ से नहीं’वो पूछती रही, मुझसे“तो यहाँ से?”और मैं केवल कहता‘नहीं, यहाँ से नहीं’वो कोशिश करती रही,मेरे उत्तर को बदलने की,मैं भी जान गया,वो रुकेगी नहीं,पूछती रहेगी,ढूँढ़ निकालेगी अपनी राह,वो करती रहेगी,कोशिश अपनी।

एक-क्लिक

एक क्लिक पर जो भी कुछ मिल जाता है, उससे ही केवल कहाँ ?यह जीवन चल पाता है !वह क्लिक करता रहा रातभर,और मैं सोता रहा रातभरसुबह को वह हारा हुआ था, थका हुआ था,वह अभी जीवन जीने को रुका हुआ था।मेरी आँखों में चमक थी, चाँदी-सी,उसे अब भी फिक्र थी चाँदी की।दिन गुजरा मानोContinue reading “एक-क्लिक”

माँग की सिन्दूर-रेखा (सबसे प्रिय कविता)- BY KUMAR Vishwas

माँग की सिन्दूर-रेखा, तुमसे यह पूछेगी कल… “यूँ मुझे सिर पर सजाने का तुम्हें अधिकार क्या है?” तुम कहोगी- “वह समर्पण बचपना था” तो कहेगी… “गर वो सब कुछ बचपना था, तो कहो फिर प्यार क्या है?” कल कोई अल्हड़, अयाना, बावरा झोंका पवन का, जब तुम्हारे इंगितों पर, गन्ध भर देगा चमन में, याContinue reading “माँग की सिन्दूर-रेखा (सबसे प्रिय कविता)- BY KUMAR Vishwas”

Happy Valentine’s Day

अलग ही ठीक हैं हम, अगर ‘ठीक’ हैं हम!

दुष्ट काज़ी- A Akbar-Birbal story

एक दिन बादशाह अकबर के दरबार मे एक किसान आया, उसका नाम सैफ अली था। अकबर उससे कहतें हैं: अकबर – बोलो कैसे आना हुआ? सैफ अली – जहाँ पनाह छह महीने पहले मेरी बीबी गुज़र गई, जिसके चलते मैं अपनी ज़िंदगी मे बिल्कुल अकेला हो गया हूँ। अभी छह महीने पहले बहुत खुशी सेContinue reading “दुष्ट काज़ी- A Akbar-Birbal story”

‘नाच’ (कविता)- महाकवि ‘अज्ञेय’

एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ।जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँवह दो खम्भों के बीच है।रस्सी पर मैं जो नाचता हूँवह एक खम्भे से दूसरे खम्भे तक का नाच है।दो खम्भों के बीच जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँउस पर तीखी रोशनी पड़ती हैजिस में लोग मेराContinue reading “‘नाच’ (कविता)- महाकवि ‘अज्ञेय’”

केवल तुक मिलाए-1

लेखनी चल निकली थी, मेरी किस्मत खूब फली थी, मैं सोकर भी चबाता था, मेरे हाथ ऐसी मूँगफली थी। मैंने ऐसे पल गुजारे थे, जिनमें हँसी के फव्वारे थे, जीवन में फूल थे कई, कई फूल काँटों के सहारे थे। घड़ियों को मैं तकता रहता था, मन भी कुछ खास बकता रहता था, उस परContinue reading “केवल तुक मिलाए-1”

बीरबल की खिचड़ी-Akbar Birbal story

दोस्तों आप सब ने हिंदी में एक कहावत सुनी होगी “बीरबल की खिचड़ी पकाना.” क्या आप जानते हैं कि इस कहावत के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। ये कहानी अकबर और उनके नवरत्न बीरबल से जुडी है। इसी कहानी के आधार पर प्रसिद्द कहावत “बीरबल की खिचड़ी पकाना” का उपयोग शुरू होता आया है। कहानीContinue reading “बीरबल की खिचड़ी-Akbar Birbal story”

अश्‍लील साहित्‍य (व्यंग्य किंतु सत्य)

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहां भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होलीContinue reading “अश्‍लील साहित्‍य (व्यंग्य किंतु सत्य)”

लड़ाई (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

चोपड़ा साहब और साहनी साहब के बंगले लगे हुए थे। बीच में एक दीवार थी। दाेनों एक-एक कुत्ता पाले थे। कुत्ते भयंकर थे और मुहल्ले के लोग डरते-डरते सड़क के दूसरे किनारे से निकलते थे। यों चोपड़ा साहब और साहनी साहब का स्वभाव और व्यक्तित्व ऐसा था कि उन्हें अलग से कुत्ता रखने की जरूरतContinue reading “लड़ाई (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई”

Akbar birbal story

बीरबल एक ईमानदार तथा धर्म-प्रिय व्यक्ति था। वह प्रतिदिन ईश्वर की आराधना बिना नागा किया करता था। इससे उसे नैतिक व मानसिक बल प्राप्त होता था। वह अक्सर कहा करता था कि ईश्वर जो कुछ भी करता है मनुष्य के भले के लिए ही करता है। कभी-कभी हमें ऐसा लगता है कि ईश्वर हम परContinue reading “Akbar birbal story”

बंद कमरा- (कविता)

उस बंद कमरे में दो ही चीजें थीं, एक तो वह सन्नाटा, साँय-साँय का विलाप करता, उसके सुर अनायास मेरे कानों की संवेदनहीनता को समाप्त करते थे, और एक वह अंधेरा था, जिसे खत्म करने के लिये, एक ही दिया काफी था सघन अंधेरे और सन्नाटे, दोनों को नष्ट करने के लिये, कोई मसीहा आएगा,Continue reading “बंद कमरा- (कविता)”

वादों से, विवादों से नहीं मिलता!

वादों से, विवादों से नहीं मिलता, वो कमजोर इरादों से नहीं मिलता, वो मिलता है फकीरों को पैरों में जिनके ताज होते हैं, मन के सिकंदरों को मिलता है वो, महल के शहजादों को नहीं मिलता, झुकने वाले प्यादों की तो क्या बिसात, बड़े-बड़े नवाबजादों को नहीं मिलता । तलाशने उसे निकले हो? ख्याल रखना,Continue reading “वादों से, विवादों से नहीं मिलता!”

रिक्त-अरिक्त

रिक्त आकाश के रिक्त होने को, अरिक्त पक्षियों ने बना दिया। रिक्त-अरिक्तों के गूढ़ खेल को, खेलने से मैंने तो मना किया। वो जब जाएंगे उड़कर घरों में, तब फिर से शून्य-सा हो जाएगा। सब खेल खत्म हो जाएगा, और, अरिक्तपन खिलाड़ी ले जाएगा।

Hindi Poem on Girl Abuse – Main Janam Lu Bhi Ki Nahi — Hindi Poems|हिंदी कविता संग्रह

मैं जन्म लू भी कि नहीं? (कविता का शीर्षक)मैं क्या पहनूं,जो तेरी नज़र मेरे आँचल पर ना पड़े?मैं किस समय घर से निकलूं,जो तेरी नौका मेरे बांध से ना सटे?मैं किस तरह चलूँ,कि मेरी चाल तुझे न्योता ना लगे?मैं कैसे बोलूंजो तेरा खून का दौर सही दिशा में ही बहे?मैं जन्म लूँ भी कि नहीं,मैंने […]Continue reading “Hindi Poem on Girl Abuse – Main Janam Lu Bhi Ki Nahi — Hindi Poems|हिंदी कविता संग्रह”

पता चला!

तलाशने मैं जो चला था किसी वीराने शहर को, पता चला, दुनिया में मुझ-सा कोई वीराना नहीं था। अनजान हाथों को राह में जो थामा तो, पता चला, उन हाथों से कोई याराना नहीं था। खूब जब घूम लिया, कोने-कोने को छान लिया, पता चला, कोई शख्श नहीं था, जो अनजाना नहीं था। आज फिरContinue reading “पता चला!”

ठिठुरता हुआ गणतंत्र -हरिशंकर परसाई (व्यंग्य)

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्यContinue reading “ठिठुरता हुआ गणतंत्र -हरिशंकर परसाई (व्यंग्य)”

चींटी का भविष्य

चींटी, एक ज्योतिषी हूँ मैं, मुझे लकीरें दिखाओ, अपने हाथ-पैरों की देखूँ तो तुम्हारा भविष्य, कहाँ तक का सफर रहेगा, पर्वत कौन-से चढ़ने होंगे, कितनी खाइयों की गहराइयाँ नापनी होंगी, कितनी दफा भार खुद से अधिक का उठाना होगा, कितनी बार उठाकर दाने को दूर गोदाम तक पहुँचाकर, अपना नाम दर्ज कराना होगा चींटी, मुझेContinue reading “चींटी का भविष्य”

पानी का ग्लास और सेठ की प्यास

एक बार किसी रेलवे प्लेटफार्म पर जब गाड़ी रुकी, तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला। ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसको आवाज दी, ‘ऐ लड़के इधर आ।’ लड़का दौड़कर आया। उसने पानी का ग्लास भरकर सेठ की ओर बढ़ाया, तो सेठ ने पूछा, ‘कितने पैसे में?’ लड़के ने कहा, ‘पच्चीस पैसे।’ सेठ नेContinue reading “पानी का ग्लास और सेठ की प्यास”

रातभर…

ओस फूलों पर पड़ी थी रातभर, सूरज! तुम कहां गये थे रातभर? फूल! काफी मुस्कुरा रहे हो आज, किससे बातें होती रहीं रातभर? सुगंध कैसी अनोखी आज इनकी है! चाँद! इत्र छिड़क गया होगे रातभर। आने वाले कल ये मुरझाने वाले हैं, काँटो! बड़े प्रेम से रहना आज रातभर।

बीतेंगे..

बीतेंगे हम फिर जन्मेंगे जीयेंगे फिर बीतेंगे फिर जन्मेंगे हारेंगे या जीतेंगे, नहीं पता बीतना, जन्मना, जीना और बीतना इसके लिए ही केवल क्यों सीखना? क्यों जानना? सूरज, तारों के जन्मकाल अधिक हैं लेकिन वे भी बीतेंगे और जन्मेंगे क्या वे भी सीखेंगे? और हम? शायद फिर से हम केवल बीतेंगे और जन्मेंगे, या जीतेंगेContinue reading “बीतेंगे..”

कवि सोचता है…

कवि सोचता है कि वो निर्जीव खड़ी साईकिल भी उससे कुछ कह रही है। सोचता दो पहिये वाली वो उड़कर उसके मन में बह रही है। कवि सोचता है कि वो गतिमान पतंग उससे कुछ कहना चाहती है, सोचता धागे से बँधकर वो न कटना, सदा आकाश में रहना चाहती है। कवि सोचता है किContinue reading “कवि सोचता है…”


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