किताब का खत्म होना- पैट्रिक मोदियानो

मैं उस पीढ़ी का हूँ जिसमें बच्चों को देखा जाता था, सुना नहीं जाता था, सुना खास मौकों पर ही जाता था वह भी पहले से अनुमति मिलने पर। लेकिन उन्हें कोई नहीं सुनता था और लोग उनके बोलने पर खुद भी बोलते रहते थे। शायद यही कारण है कि बचपन समाप्त होते होते मुझमें लिखने की इच्छा जाग गई। इस उम्मीद कि आप जो लिख रहे हैं उसे बडे़ लोग पढेंगे। तब वे बीच में काटे बिना आपकी बात पूरी तरह सुनेंगे और उन्हें पता चलेगा कि आपके सीने के भीतर भी कुछ चलता है। लेखन एक अजीब और एकांतिक क्रिया है। जब आप अपने उपन्यास के शुरुआती कुछ पन्ने लिखने बैठते हैं तब निराश कर देने वाले कई मौके आते हैं। हर रोज आपको यह लगता है कि आप गलत राह पर बढ़ चले हैं। जब आपकी किताब पूरी होने वाली होती है, तब आपको महसूस होता है कि उसने खुद को आपसे दूर करना शुरु कर दिया है, और अब वह खुली हवा में आजाद साँस लेने लगी है। इस क्षण के बाद वह खुद को अपने पाठकों के जरिये खोजेगी। जब ऐसा होता है, आप खालीपन की एक अनूभूति से भर जाते हैं, ऐसा लगता है, कि आप परित्यक्त हों, आप छोडे़ जा चुके हैं। एक खास तरह की निराशा भी होती है, क्योंकि आपने बहुत धीरे-धीरे किताब के साथ एक रिश्ता बनाया था और वह एक झटके में उसे तोड़ गयी। पाठक किसी किताब के बारे में लेखक से ज्यादा जानता है। लेकिन लेखक और उसके पाठक के बीच एक ऐसा मधुर सामंजस्य विकसित हो सके, इसके लिये जरुरी है कि पाठक पर जरुरत से ज्यादा जोर न दिया जाये। पाठक को अनायास ही अपनी तरफ करने के लिये जरुरी है कि किताब के भीतर इतनी जगह छोड़ी जाये, जिसमें वह रफ्ता-रफ्ता पैंठ सके और जगह छ़ोडने में कलात्मकता हो।

पैट्रिक मोदियानो एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक हैं। उन्हें 2014 के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। इनकी कृतियों का 30 से ज़्यादा भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

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