अनमोल चित्र- कहानी

दिन निकलते ही सूरज ने आग उगलना शुरु कर दिया था। उमस से जंगल में लकड़ी काटते हुए कमली को सारा शरीर पसीने से लथपथ हो गया था।

‘माँ! और कितनी देर लगेगी?’

“घीसू कुछ देर और लगेगी लकड़ी काटने में।”

उसने अपने हाथों की गति और बढ़ा दी, ताकि लकड़ियाँ काटकर बाजार पहुँच सके।

लकड़ी का गट्ठर बना घीसू का हाथ पकड़ पगडंडी पर चल दी।

“माँ, प्यास लगी है।”

“घीसू थोड़ा आगे ही झरना है, वहीं चलकर पानी पीयेंगे।”

चलते-चलते झरने के पास पहुँचकर लकड़ी के गट्ठर को पेड़ से टिकाकर कमली वहीं बैठ गई।

“जाओ पहले तुम पानी पी आओ।”
घीसू पानी पीने चला गया।

‘माँ! लो पानी पी लो।’

कमली ने आँखें खोलीं, तो घीसू ढाक के पत्तों का दोना बना पानी लिये खड़ा था। कमली ने झट से पानी पीकर बेटे को छाती से लगाकर गोद में बिठा लिया।

‘माँ! वो ऊपर देखो पेड़ पर जलेबी लगी है, माँ मुझे चाहिये।’

लकड़ी निकालकर माँ जंगली जलेबी तोड़ने लगी, घीसू खुशी से उछल-उछलकर जेब में भरने लगा।

कुछ ही दूरी पर बैठा चित्रकार इस मनोरम दृश्य को अपने कैनवास में कैद कर लेता है। चित्र को निहारते हुए उसे बच्चे की मुस्कान में एक चुंबकीय आकर्षण का एहसास हो रहा था।

अचानक ध्यान घड़ी की तरफ गया, चित्रकार ने जल्दी से अपने रंग कूची कैनवास समेटे और साइकिल पर लादकर चला दिया।

वह रास्ते भर यही सोचता रहा कि महीनों से चढा मकान का किराया चुका दूंगा। चित्रकार ने अंदर पहुँचकर चित्र प्रदर्शनी में लगा दिये। हर कोई उसके बनाये चित्रों की प्रशंसा कर रहा था।

एक व्यक्ति बड़ी देर से मुस्कुराते हुए बच्चे के चित्र के पास खड़े होकर चित्र को निहार रहा था।

उसने चित्रकार से कहा, ‘इस चित्र को मैं खरीदना चाहता हूँ।’

‘जनाब यह चित्र मैं नहीं बेचूंगा।’

‘ये चित्र मेरे लिये अनमोल है। मैं कला का पारखी हूँ, तुम्हें इसके इतने दाम दूँगा कि सालों बैठकर खा सकते हो। मेरी बात मान लो वरना पछतावा होगा।’

शाम को प्रदर्शनी समाप्त होने पर चित्रकार के कुछ अन्य चित्र बिक गये। चित्रकार ने बच्चे के चित्र को निहारा फिर प्यार से सहलाया और घर की ओर बढ़ा। लेकिन रास्ते में माँ-बेटा दोनों मिल गये।

चित्रकार ने आवाज दी, ‘लकड़ी बेचोगी।’

‘हाँ साहब बेचेंगे।’ 

‘कितने में दोगी?’

‘जो दे देंगे मैं ले लूंगी साहब।’

चित्रकार ने जेब से पैसे निकाल कर उसके हाथ पर रख दिये।

‘ये तो लकड़ी की कीमत से ज्यादा पैसे हैं।’

‘रख लो, तुम्हारे काम आएंगे।’

नहीं साहब मुझे सिर्फ लकड़ी के पैसे चाहिये और बाकी पैसे चित्रकार को दे दिये।
आज जरूरत नहीं होते हुए भी चित्रकार ने लकड़ियाँ खरीद ली थीं। पैसों को अंटी में बाँधते हुए एक संतोष भरी मुस्कान औरत के चेहरे पर थी। चित्रकार लकड़ी का गट्ठर साइकिल पर बांधकर प्रसन्न मन से गुनगुनाते हुए घर की ओर चल पड़ा।

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