नींद में निर्मल होते हैं हम- कारेल चपेक

रात होते ही दूसरी जिंदगी शुरु हो जाती है, पीड़ा और दुविधा से भरी हुई। जो आदमी सो नहीं पाता, वह किसी भी चीज से छुटकारा नहीं पा सकता। जब आदमी सो नहीं पाता, तो शुरु-शुरु में वह किसी के बारे में कुछ नहीं सोचना चाहता। वह या तो गिनती गिनने लगता है, या प्रार्थना करने लगता है। पिर अचानक उसे बीच में ही ख्याल आता है- हे ईश्वर! कल में अमुक काम करना भूल गया। और बाद में एक नया ख्याल तंग करने लगता है कि कल सौदा खरीदते समय दुकानदार ने उसे ठग लिया था। फिर उसे सहसा याद आता है कि उस दिन उसके मित्र ने कितने अजीब ढंग से उससे बातचीत की थी। नींद सिर्फ एक शारीरिक विश्राम नहीं है, नींद एक प्रकार से बीते हुए दिन का प्रायश्चित्त और शुद्धीकरण है। वह क्षमादान है। अच्छी नींद के पहले कुछ मिनटों में हर व्यक्ति की आत्मा पवित्र और निर्मल हो जाती है। नींद एक गहरे अंधेरे पानी की तरह है। उसमें वह सब कुछ बह जाता है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते और जिसके बारे में हमें कुछ नहीं जानना चाहिये। हमारे भीतर जो अजीब-सा कीचड़ जमा हो जाता है, नींद उसे बहाकर उस अचेतन में डुबो देती है, जो अपने में असीम है। हमारी नीचता और कायरता…रोजमर्रा के हमारे कुलबुलाते पाप, हमारी लज्जास्पद मूर्खतायें और असफलतायें, अपने प्रिय लोगों की आँखों में झूठ और घृणा देखने की पीड़ा, वे लोग जिन पर हम लांछन लगाते हैं और वे लोग जो हम पर लांछन लगाते हैं…ये सब चीजें रात की सुप्त घड़ियों में चुपचाप चेतना के नीचे बह जाती है। नींद की दया असीम है…वह न केवल हमें क्षमा कर देती है, बल्कि उन सबको भी, जो हमारे प्रति गुनहगार हैं।

-चेकोस्लोवाकिया के प्रख्यात लेखक कारेल चपेक

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