हरिवंशराय बच्चन की बेहतरीन कवितायें- संग्रह 1

HARIVANSH RAI BACHCHAN

मित्रों, जिनका नाम ही लेने को मैं छोटा हूँ, वहाँ पर उनकी कविताओं को जानने और समझने का प्रयास मेरे द्वारा हो रहा है इस बात से ही मैं चकित हूँ। मुझे कई लेखक और उनकी कवितायें पसंद हैं। उदाहरण के तौर पर रामधारी सिंह ‘दिनकर’, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय, नागार्जुन, मैथिलीशरण गुप्त आदि सभी को मैं बचपन से पढ़ता आ रहा हूँ लेकिन अगर इन सभी कवियों के बीच अगर ‘हरिवंशराय बच्चन’ का नाम न होगा तो शायद इस सूची को मेरे द्वारा अपूर्ण ही माना जाएगा। क्योंकि जिनकी कवितायें मेरे जीवन एक अंग बन चुकी हों, जिन्हें मैंने साइकिल पर घूमते हुए गाया, बरसात के मौसम में गाया, आधी रात को गाया और किसी साथी व्यक्ति की याद में गुनगुनाया हो उनके बिना मेरी कोई भी सूची कैसे अधुरी न रहे।

बच्चन जी अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति मधुशाला के लिये सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं। मधुशाला बच्चन जी के काव्य कोष की सबसे अधिक चमक बिखेरती और काली अंधेरी रातों में भी आसानी से दिखने वाले ध्रुव तारे की तरह है जो अपनी पहचान इतने वर्षों के बाद भी बरकरार रखे हुए हैं। किन्तु उन्होंने कई अन्य छोटी-छोटी कवितायें भी लिखीं। जिनमें से मैं शायद बहुत कम पढ़ और उससे भी कम समझ पाया हूँ। उनकी ऐसी ही कुछ कविताओं को पढ़ने से शायद आपको भी उतना रोमांच उत्पन्न होगा जितना कि मुझे हुआ था। तो मित्रों आइये पढ़ते हैं उनकी वे कवितायें…..

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

यह अधिकार कहाँ से लाया?
और न कुछ मैं कहने पाया
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

-हरिवंशराय बच्चन

मैं कल रात नहीं रोया था

दुख सब जीवन के विस्मृत कर,
तेरे वक्षस्थल पर सिर धर,
तेरी गोदी में चिड़िया के बच्चे-सा छिपकर सोया था!
मैं कल रात नहीं रोया था!

प्यार-भरे उपवन में घूमा,
फल खाए, फूलों को चूमा,
कल दुर्दिन का भार न अपने पंखो पर मैंने ढोया था!
मैं कल रात नहीं रोया था!

आँसू के दाने बरसाकर
किन आँखो ने तेरे उर पर
ऐसे सपनों के मधुवन का मधुमय बीज, बता, बोया था?
मैं कल रात नहीं रोया था!

-हरिवंशराय बच्चन

क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं

अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी घड़ियों को किन-किन से आबाद करूँ मैं?
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

याद सुखों की आँसू लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

दोनों करके पछताता हूँ,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूँ,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं?
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

-हरिवंशराय बच्चन

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