कुछ बहुत बुरा होने के इंतजार में…

एक से गांव में एक बूढ़ी औरत रहती थी, जिसके दो बच्चे थे, पहला सत्रह साल का, दूसरा चौदह का। वह उन्हें नाश्ता परोस रही है। और उसके चेहरे पर किसी चिंता की लकीरें स्पष्ट हैं। बच्चे उससे पूछते हैं कि उसे क्या हुआ है, तो वह बोलती है, “मुझे नहीं पता, लेकिन मैं इस पूर्वाभास के साथ जागी रही हूं, कि इस गांव के साथ कुछ बुरा होने वाला है।”

दोनों अपनी मां पर हंस देते हैं। लड़का पूल खेलने चला जाता है, अभी वह एक बेहद आसान गोले को जीतने ही वाला होता है कि दूसरा खिलाड़ी बोल पड़ता है, “मैं एक पैसों की शर्त लगाता हूं कि तुम इसे नहीं जीत पाओगे।” आसपास का हर कोई हंस देता है। लड़का भी हंसता है। वह गोला खेलता है और जीत नहीं पाता।

शर्त के अनुसार वह पैसे चुकाता है और सब उससे पूछते हैं कि क्या हुआ, कितना तो आसान था, उसे जीतना। वह बोलता है, “बेशक पर मुझे एक बात की फिक्र थी, जो आज सुबह मेरी मां ने बताया कि इस गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है।” सब लोग उस पर हंस देते हैं।

पैसों को जीतने वाला शख्स अपने घर लौट आता है, जहाँ वह अपनी मां और रिश्तेदार के साथ होता है। वह अपने पैसों को खुशी-खुशी दिखाते हुए कहता है, “मैंने यह पैसे दामासों से बेहद आसानी से जीत लिये क्योंकि वह मूर्ख है।”

“और वह मूर्ख क्यों है?” “भई!” क्योंकि वह एक सबसे आसान-सा गोला अपनी मां के एक पूर्वाभास की फिक्र में नहीं जीत पाया, जिसके मुताबिक इस गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है। उसकी मां कहती है, “तुम बुजुर्गों के पूर्वाभास की खिल्ली मत उड़ाओ, क्योंकि कभी-कभार वे सच भी हो जाते हैं।” रिश्तेदार इसे सुनती है और गोश्त खरीदने चली जाती है। वह कसाई से कहती है, “एक पाउंड गोश्त दे दो या ऐसा करो जब गोश्त काटा ही जा रहा है, तब बेहतर है कि दो पाउंड…मुझे कुछ ज्यादा दे दो, क्योंकि लोग यह कहते फिर रहे हैं कि गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है।”

कसाई उस गोश्त थमाता है और जब एक दूसरी महिला एक पाउंड गोश्त खरीदने पहुँचती है, तो उनसे कहता है, आप दो ले जाइये, क्योंकि लोग यह कहते फिर रहे हैं कि गांव के साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है और उसके लिये तैयार हो रहे हैं। जिस पर महिला कहती है, “मेरे कई सारे बच्चे हैं। सुनो, बेहतर है कि तुम मुझे चार पाउंड दे दो।” वह चार पाउंड गोश्त लेकर चली जाती है और कसाई का सारा गोश्त अगले आधे घंटे में खत्म हो जाता है।

यह अफवाह फैलती चली जाती है। एक वक्त ऐसा आता है कि उस गांव के समूचे लोग कुछ होने का इंतजार करने लगते हैं। लोगों की हरकतों को जैसे लकवा मार गया होता है कि अकस्मात दोपहर के बारह बजे, हमेशा की ही तरह गर्मी अधिक होती है। कोई कहता है, “किसी ने गौर किया कि कैसी गर्मी है आज?” लेकिन इस गांव में तो हमेशा से इतनी ही गर्मी पड़ती रही है। इतनी गर्मी जिसमें गांव के ढोलकिये बाजों को तार से छापकर रखते थे और उन्हें छांव में बजाते थे, क्योंकि धूप में बजाने पर वे टपककर बर्बाद हो जाते थे।

जो भी हो, लेकिन इतनी गर्मी पहले कभी नहीं हुई थी। वीरान से गांव पर, शांत खुले चौपाल में अचानक एक छोटी चिड़िया उतरती है और आवाज होती है, जिसे सुन भय से कांपता समूचा गांव चिड़िया को देखने आ जाता है। लेकिन सज्जनों चिड़िया का उतरना तो हमेशा से ही होता रहा है। हां, लेकिन इस वक्त पर कभी नहीं। गांववासियों के बीच एक ऐसे तनाव का क्षण आ जाता है कि हर कोई वहाँ से चले जाने को बेसब्र हो उठता है, लेकिन ऐसा करने का साहस नहीं जुटा पाता।

तभी कोई चिल्लाता है, “मुझमें है इतनी हिम्मत, मैं तो निकलता हूं।” वह अपने असबाब, बच्चों और जानवरों को गाड़ी में समेटता है और उस गली के बीच से गुजरने लगता है, जहाँ से लोग यह सब देख रहे होते हैं। इस बीच लोग कहने लगते हैं, अगर यह इतनी हिम्मत दिखा सकता है, तो फिर हम लोग भी चल निकलते हैं। और लोग सच में धीरे-धीरे गांव को खाली करने लगते हैं। अपने साथ सामान, जानवर और सब कुछ ले जाते हुए। जा रहे आखिरी लोगों में से एक कहता है, “ऐसा न हो इस अभिशाप का असर हमारे घर मं रह-सह गई चीजों पर भी आ पड़े” और आग लगा देता है। फिर दूसरे भी अपने-अपने घरों में आग लगा देते हैं। एक भयंकर अफरा-तफरी के साथ लोग भागते हैं, जैसे कि किसी युद्ध के लिये प्रस्थान हो रहा हो।

उन सबके बीच से हौले से पूर्वाभास कर लेने वाली महिला भी गुजरती है, मैंने बताया था न कि कुछ बहुत बुरा होने जा रहा है और लोगों ने कहा था कि मैं पागल हूं।

कहानी द्वारा – गैब्रियल गार्सिया मार्केज

गैब्रियल गार्सिया मार्केज स्पेनिश भाषा के महानतम रचनाकारों में गिने जाते हैं, उन्हें मुख्य रूप से उनकी पुस्तक ‘A Hundred Years of Solitude’ के लिये जाना जाता है।

वे कहते थे – हमेशा प्यार करने के लिये कुछ-न-कुछ बचा ही रहता है।

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