बुद्ध की कहानियाँ-1 (पुत्र वियोग से पीड़ित स्त्री)

बात उन दिनों की है, जब ज्ञान प्राप्त होने के बाद गौतम बुद्ध आम जनता के बीच उनके दुखों से मुक्ति के उपाय बताते हुए बाकी जीवन को गुजारने का फैसला कर चुके थे। उनकी उनकी कीर्ति भी फैलने लगी थी।

एक बार उनके पास एक स्त्री आई और विलाप करने लगी कि उसके इकलौते पुत्र की सांप के काटने से मृत्यु हो गई है। रोते हुए उसने गौतम बुद्ध से प्रार्थना की कि वे उसके पुत्र को दोबारा जीवित करके उसे इस भीषण दुख से मुक्ति दिलाएं।

गौतम बुद्ध ने उससे प्रश्न किया, “क्या तुम नहीं जानती कि संसार में जो कोई भी जन्म लेता है, उसका एक दिन अंत अवश्य ही होता है?”

वह स्त्री बोली, “जानती हूं, किंतु यह मेरा इकलौता पुत्र है और आप पहुँचे हुए महात्मा हैं, आप में इतनी शक्ति है कि आप मेरे पुत्र को दोबारा जीवित कर सकते हैं। इसीलिये भगवन् मैं आपसे अपने पुत्र के जीवन हेतु याचना कर रही हूं। यदि आप उसे जीवित नहीं कर सकते तो आपका परमज्ञान की इस अवस्था में होने का क्या लाभ?”

गौतम बुद्ध ने जान लिया कि पुत्र के वियोग में व्याकुल इस स्त्री को इसकी मौजुदा दशा में कुछ भी समझाना व्यर्थ होगा।

गौतम ने कहा, “ठीक है मैं तुम्हारे पुत्र को पुनर्जीवित कर सकता हूं किंतु इसका एक ही उपाय है। मगर तुम्हारे पुत्र को पुनर्जीवित करने के लिये तुझे सूर्यास्त होने से पहले किसी ऐसे घर से सरसों के दाने लाने होंगे, जिस घर के लोग कभी भी किसी की मृत्यु में शोकाकुल न हुए हों। जिस घर में कभी भी किसी की मृत्यु न हुई हो।”

पुत्र के पुनर्जीवित होने की उम्मीद से स्त्री के मन में आशा का संचार हुआ। उसने सोचा कि सरसों के दाने तो हर किसी घर से प्राप्त हो जाएंगे, किंतु जिस किसी भी घर में वह जाती उसे उस घर किसी न किसी की मृत्यु की बात का पता चलता।

बहुत प्रयास करने के बाद भी, अनेक घरों में ढूंढ़ने के पर भी जब उसे ऐसा घर न मिला जहाँ किसी भी व्यक्ति की मृत्यु न हुई हो, वह थककर चूर-चूर हो गई।

सूर्यास्त होने लगा था। वह गौतम के वापस लौटने लगी। लौटते समय उसका मन पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शांत और अविचल था। वह यह बात पहचान गई थी कि मृत्यु अटल और अवश्यंभावी है और सभी की एक-न-एक दिन मृत्यु अवश्य होनी है।

गौतम बुद्ध के पास जाकर उसने कहा, “भगवन, मुझे ऐसा कोई भी घर न मिला जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो। मैं यह बात समझ चुकी हूं कि इस संसार में जिसका भी जन्म हुआ है वह मरणशील है।”

स्त्री ने विधिवत अपने पुत्र का अंतिम संस्कार किया और अपने अपने आगे के जीवन को, जीवन के सार्थक पहलुओं की खोज में व्यतीत करने निर्णय किया और गौतम बुद्ध के साथ चल पड़ी।

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