‘कवि सोचता है’- हिंदी कविता- PAmit Hindi Poems

कवि सोचता है कि वो निर्जीव खड़ी
साईकिल भी उससे कुछ कह रही है।
सोचता दो पहिये वाली वो उड़कर
उसके मन में बह रही है।

कवि सोचता है कि वो गतिमान
पतंग उससे कुछ कहना चाहती है,
सोचता धागे से बँधकर वो न कटना,
सदा आकाश में रहना चाहती है।

कवि सोचता है कि उस खंडहर घर की,
एक-एक ईंट उससे कह रही है
वर्षों के अकेलेपन से वे अब टूटने को हैं,
परस्पर अब साथ उनका छूटने को है।