माँग की सिन्दूर-रेखा (सबसे प्रिय कविता)- BY KUMAR Vishwas

माँग की सिन्दूर-रेखा, तुमसे यह पूछेगी कल…
“यूँ मुझे सिर पर सजाने का तुम्हें अधिकार क्या है?”
तुम कहोगी- “वह समर्पण बचपना था” तो कहेगी…
“गर वो सब कुछ बचपना था,
तो कहो फिर प्यार क्या है?”

कल कोई अल्हड़, अयाना, बावरा झोंका पवन का,
जब तुम्हारे इंगितों पर, गन्ध भर देगा चमन में,
या कोई चंदा धरा का, रूप का मारा, वेचारा,
कल्पना के तार से, नक्षत्र जड़ देगा गगन में,
तब किसी आशीष का आँचल, मचल कर पूछ लेगा,
“यह नयन-विनिमय अगर है
प्यार, तो व्यापार क्या है?”

कल तुम्हारे गन्धवाही-केश जब उड़कर किसी की
आँख को, उल्लास का आकाश कर देंगे कहीं पर,
और साँसो के मयलवाही झकोरे, मुझ सरीखे
नव-विटप को, सावनी-वातास कर देंगे वहीं पर,
तब यही बिछुए, महावर, चूड़ियाँ, गजरे कहेंगे…
“इस अमर-सौभाग्य के
श्रृँगार का आधार क्या है?”

कल कोई दिनकर, विजय का सेहरा सर पर सजाये,
जब तुम्हारी सप्तवर्णी-छाँह में सोने चलेगा,
या कोई हारा-थका व्याकुल सिपाही जब तुम्हारे,
वक्ष पर धर शीष, लेकर हिचकियाँ रोने लगेगा,
तब किसी तन पर कसी दो बाँह जुड़ कर पूछ लेंगी…
“इस प्रणय जीवन-समर में
जीत क्या है? हार क्या है?”

माँग की सिन्दूर-रेखा तुमसे यह पूछेगी कल…
“यूँ मुझे सिर पर सजाने का तुम्हें अधिकार क्या है?”

-हिंदी के प्रसिद्ध कवि ‘कुमार विश्वास

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