‘जब मैंने पहली निजी पुस्तक ख़रीदी’ -डॉ. धर्मवीर भारती

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लाइब्रेरी खुलते ही पहुँच जाता और जब लाइब्रेरियन शुक्ल जी कहते कि बच्चा अब उठो, पुस्तकालय बन्द करना है तब बड़ी अनिच्छा से उठता। जिस दिन कोई उपन्यास अधूरा छूट जाता, उस दिन मन में कसक होती कि काश इतने पैसे होते कि सदस्य बन कर किताब ईश्यू करा लाता, या काश इस किताब को ख़रीद पाता तो घर में रखता। एक बार पढ़ता, दो बार पढ़ता, बार-बार पढ़ता पर जानता था कि यह सपना ही रहेगा। भला कैसे पूरा हो पाएगा।

पिता के देहावसान के बाद तो आर्थिक संकट इतना बढ़ गया कि पूछिए मत। फीस जुटाना तक मुश्किल था। अपने शौक की किताबें ख़रीदना तो सम्भव ही नहीं था। एक ट्रस्ट से योग्य पर असहाय छात्रों को पाठ्य पुस्तकें ख़रीदने के लिए कुछ रुपए सत्र के आरम्भ में मिलते थे। उनसे प्रमुख पाठ्य पुस्तकें ‘सेकेण्ड हैंण्ड’ ख़रीदता था, बाकी अपने सहपाठियों से लेकर पढ़ता और नोट्स बना लेता। उन दिनों परीक्षा के बाद छात्र अपनी पुरानी पाठ्य पुस्तकें आधे दाम में बेच देते और उस कक्षा में आने वाले नए लेकिन विपन्न छात्र ख़रीद लेते। इसी तरह काम चलता।

लेकिन फिर भी मैंने जीवन की पहली साहित्यिक पुस्तक अपने पैसों से कैसे ख़रीदी, यह आज तक याद है।

उस साल इण्टरमीडियेट पास किया था। पुरानी पाठ्य पुस्तकें बेच कर बी.ए. की पाठ्य पुस्तकें लेने एक सेकण्ड हैण्ड बुक शॉप पर गया। उस बार जाने कैसे पाठ्य पुस्तकें ख़रीद कर भी दो रुपए बच गए थे। सामने के सिनेमाघर में ‘देवदास’ लगा था न्यू थियेटर्स वाला। बहुत चर्चा थी उसकी। लेकिन मेरी माँ को सिनेमा देखना बिल्कुल नापसंद था। उसी से बच्चे बिगड़ते हैं। लेकिन उसके गाने सिनेमा गृह के बाहर बजते थे। उसमें सहगल का एक गाना था ‘दुख के दिन अब बीतत नाहीं’ उसे अक्सर गुनगुनाता रहता था। कभी-कभी गुनगुनाते आँखों में आँसू आ जाते थे जाने क्यों। एक दिन माँ ने सुना। माँ का दिल तो आखिर माँ का दिल।

एक दिन बोलीं – दुख के दिन बीत जाएँगे बेटा, दिल इतना छोटा क्यों करता है धीरज से काम ले।’
जब उन्हें मालूम हुआ कि यह तो फिल्म ‘देवदास’ का गाना है, तो सिनेमा की घोर विरोधी माँ ने कहा – अपना मन क्यों मारता है, जाकर पिक्चर देख आ। पैसे मैं दे दूँगी।’
मैंने माँ को बताया कि ‘किताबें बेच कर दो रुपए मेरे पास बचे हैं।’
वे दो रुपए लेकर माँ की सहमति से फिल्म देखने गया। पहला शो छूटने में देर थी, पास में अपनी परिचित किताब की दूकान थी। वहीं चक्कर लगाने लगा।

सहसा देखा काउन्टर पर एक पुस्तक रक्खी है – ‘देवदास’ , लेखक शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय – दाम केवल एक रुपया। मैंने पुस्तक उठा कर उलटी-पलटी तो पुस्तक विक्रेता बोला –
‘तुम विद्यार्थी हो। यहीं अपनी पुस्तकें बेचते हो। हमारे पुराने ग्राहक हो। तुमसे अपना कमीशन नहीं लूँगा। केवल दस आने में यह किताब दे दूँगा।’ मेरा मन पलट गया।
कौन देखे डेढ़ रुपए में पिक्चर? दस आने में ‘देवदास’ ख़रीदी। जल्दी-जल्दी घर लौट आया और दो रुपए में से बचे एक रुपया छ: आना माँ के हाथ में रख दिए।

‘अरे तू लौट कैसे आया? पिक्चर नहीं देखी?’ माँ ने पूछा।
‘नहीं माँ! फिल्म नहीं देखी, यह किताब ले आया। देखो।’
माँ की आँखों में आँसू आ गए। खुशी के थे, या दुख के यह नहीं मालूम।
वह मेरे अपने पैसों से ख़रीदी, मेरी अपनी निजी लाइब्रेरी की पहली किताब थी।

-डॉ. धर्मवीर भारती

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