नारी! तुम केवल श्रद्धा हो

“क्या कहती हो ठहरो नारी!
संकल्प अश्रु-जल-से-अपने।
तुम दान कर चुकी पहले ही
जीवन के सोने-से सपने।

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास-रजत-नग पगतल में।
पीयूष-स्रोत-सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में।

देवों की विजय, दानवों की
हारों का होता-युद्ध रहा।
संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित
रह नित्य-विरूद्ध रहा।

आँसू से भींगे अंचल पर
मन का सब कुछ रखना होगा-
तुमको अपनी स्मित रेखा से
यह संधिपत्र लिखना होगा।

-जयशंकर प्रसाद

5 comments

    • आपको अच्छा लगा, ये मुझे बहुत ही अच्छा लगा। इतने सुन्दर कमेंट के लिए धन्यवाद। आप सदा स्वस्थ व खुश रहें। 😀🙏

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