‘जीवन-परिधि से तुम दूर रही हो’- हिंदी कविता- PAmit Hindi Poems

अति न होगी गर कहूँ मेरे
शब्द-शब्द में तुम भरपूर रही हो,
जीवन ही होतीं मेरा, मगर
जीवन-परिधि से तुम दूर रही हो।

भाग्य रेखाओं में तो ना मिलीं पर
इस चक्र के पार भी एक जहां है,
तुम आना, मैं चलता हूँ, मैंने
गुरु से पूछ लिया, द्वार कहाँ है!

सब प्रकार की विक्षिप्तता को भूल
सहज ही हृदय के काँटे बन जाएंगे फूल,
समय के हाथों की भी कठपुतली वह जहां नहीं है
वरना हर घड़ी के पास है, दुनिया में समय कहाँ नहीं है।

आसमान से भी कर सकेंगे तब बातें, हँसी-ठिठोली,
उत्सव मनाएंगे, जब क्रम से उठेंगी दिन-रात की डोली,
तब भी देख सकूंगा, तुम्हारे अधरों को मौन में मुखरित होते,
आँसू अप्रयास ही फूट पड़ेंगे, देखना तुम मुझे रोते-रोते।

3 comments

  1. बहुत बढ़िया भाई❤😃✨

    तुम्हारे हाथ से
    छूटने वाला हाथ
    बिल्कुल सामान्य नहीं था

    उसने तुम्हारे विरह में
    पुनः प्रेम नहीं किया
    कविताएँ लिखी हैं….

    सूरज सरस्वती

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