अतुलनाय कृति है गुनाहों का देवता

अतुलनाय कृति है गुनाहों का देवता, मार्मिकता का, भावुकता का भंडार। आपने अवश्य पढ़ी होगी, अगर नहीं तो इसे पढ़ना ही चाहिये।

यह इस पुस्तक की समीक्षा नहीं है, यह तो बस मेरे मन की भावनाएं जो इसे पढ़ने के बाद उपजी हैं, वह हैं, इस उपन्यास की समीक्षा के लायक भी मैं नहीं।

आज सुबह ही इस किताब को ऑनलाइन पढ़कर समाप्त किया था, मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी अंत इस तरह से भी होगा। किस तरह से होगा, जानने के लिये पुस्तक पढिये।

सच कहूं तो इस पुस्तक को पढ़ने के कुछ पलों में मुझे लगा कि यह मैंने क्यों पढ़ा। चन्दर का सुधा के लिये डांवाडोल होता स्नेह, बिनती की पनपकर प्रगाढ़ रूप लेती चन्दर में अटूट श्रद्धा, चन्दर का निरंतर भटकाव, और न जाने क्या-क्या इस उपन्यास के शब्द-शब्द में समाहित हुआ पड़ा है।

यह उपन्यास अब भी मुझसे कहता है मुझे अभी भी तुमने पूरा नहीं पढ़ा और मुझे भी यही लगता है, पूरा उपन्यास पढ़ना अभी रह गया है, लेकिन चूँकि मुझे इसकी संक्षिप्त कहानी पता तो मुझे नहीं लगता मैं फिर उन भावों में खुद को डाल पाने का साहस भी कर सकूंगा, जो चन्दर ने सुधा के लिये, पम्मी के लिये, बिनती के लिये, सुधा ने चन्दर के लिये, गेसू ने अपने प्रेम अख्तर के लिये महसूस किये हैं, अनुभव किये हैं।

लगभग साल भर से इस उपन्यास का पढ़ना टालता रहा, शायद कहीं न कहीं मुझे पता था, इसे पढ़कर वैसा नहीं रहूंगा जैसा पढ़ने के पहले था, और शायद जिन भी लोगों ने इसे पढ़ा अधिकतर के साथ ऐसा ही हुआ होगा।

कई बार जब हम कोई कृति पढ़ते हैं, कोई अत्यंत मार्मिक कृति तो कभी-कभी हम उसके मर्म तक नहीं पहुँच पाते, कारण चाहे जो भी हों, लेकिन पुन-पुन पढ़ने पर उसका मर्म सामने आने लगता है।

यह किताब आपके जीवन को बहुत जगह स्पर्श करती है, कभी आप जान पाते हैं तो कभी नहीं।

लेकिन मैं इस पुस्तक को शायद फिर पढ़ूँ या न पढूं, यह इस पर निर्भर करता है, कि मैं रोने के लिये तैयार हूँ या नहीं, क्योंकि इस बार यह मुझे अंतर तक स्पर्श कर लेगी, ऐसा लगता है। मैं फिर से सुधा, बिनती और चन्दर की पीड़ा को महसूस नहीं करना चाहता बस इसलिये।

पिछले कुछ महीनों में मैंने अज्ञेय द्वारा रचित उपन्यास पढ़ा था नदी के द्वीप, लेकिन वह अधिक बौद्धिकता और तर्क आदि पर आधारित है, और अज्ञेय की भाषा शैली समझने के लिये उसे कई बार पढ़ना होगा कि लेखक क्या कह रहा है, ऐसा मुझे लगता है।

लेकिन गुनाहों का देवता अधिक आसान भाषा और हमारे जीवन के विभिन्न तथ्यों को गहराई से छूने वाले कृति है।

मुझे तब लेखक की ये पंक्तियाँ तब समझ नहीं आतीं, जब इसके बारे में छान-बीन करता था, अब समझ आती हैं।

मेरे लिए इस उपन्यास का लिखना वैसा ही रहा है जैसा पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था से प्रार्थना करना, और इस समय भी मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं वह प्रार्थना मन-ही-मन दोहरा रहा हूँ, बस………………….धर्मवीर भारती

तो कुल मिलाकर बात यह है कि यह यकीनन हिंदी साहित्य का मास्टरपीस है या एक स्तंभ है जो अब भी उतनी ही मजबूती से खड़ा है जितना कि तब या, या, या। लेखक ने अपने प्राण डाल दिये हैं इसे लिखने में।

अगर आप किसी को प्रेम करते हैं, या नहीं करते हैं, घृणा करते हैं, या नहीं करते हैं या कुछ भी जो आप करते हैं या नहीं करते हैं, यह कृति आफ ही के लिये है, यह समझिये।

इस सबके बाद लेखक को कुछ भी अर्पित करना तिनके के समान है, बस सिर झुकाकर 🙏🙏🙏

पुस्तक से पसंदीदा-

बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहाँ,
वह मजा जो भीगी-भीगी घास पर सोने में है,
मुतमइन बेफिक्र लोगों की हँसी में भी कहाँ,
लुत्फ जो एक-दूसरे को देखकर रोने में है।

धन्यवाद।

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