‘अकेलापन और एकांत’- लेख/निबंध

बाल्यकाल में माता से कुछ समय के लिये दूर चले जाने पर,  बालक तब तक रोता रहता है, जब तक कि उसकी जननी उसे फिर से अपने आँचल में लेकर उसके अकेलेपन के अहसास को दूर न कर दे।

शायद उस बालक को अकेलापन ही अखरता होगा,  इसीलिये इसीलिये माँ के वापस आ जाने पर वह क्रन्दन करना छोड़कर शांत हो जाता है।

कभी-कभी हम भी उस अकेलेपन के अहसास से गुजरते हैं, किंतु इसका स्वरूप वैसा नहीं है, जैसा एक बालक को होता है।

हमारा अकेलापन या तो हमें बहुत ही अवसाद से भर देता है या बहुत आनंद से। निर्भर इस पर है कि हम अपने अकेलेपन को किस तरह जीते है। अगर हम अकेलेपन में केवल अपने अकेले होने की भावना महसूस करते रहेंगे तो धीरे-धीरे यह भावना एक अवसाद का रूप ले लेगी। परन्तु जब अकेलापन एकांत के  रूप में परिणत होता है तो यह नव-जीवनदायक हो जाता है। यह हमारे आनंद में वृद्धि करता है। हम स्वयं के होने का आनंद अनुभव करते हैं।

-PAMIT HINDI

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