आर्थिक समस्याएं- लेख/निबंध/व्यंग्य- PAMIT Hindi

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आर्थिक समस्याएं किसे नहीं होती। जीव-जन्तुओं को ही नहीं होती, आश्चर्य की बात है हमारे पड़ोसी भजनलाल को भी नहीं है। खैर वे हैं तो मनुष्य ही, और इसकी गवाही मैं अदालत में भी दे सकता हूँ, अकस्मात सर्दी-जुकाम के बढ़ जाने के कारण घर पर रुक जाना पड़े तो क्षमा भी न मांगू, इतना छोटा मन मेरा नही हैं।
मनुष्य का मन बड़ा होना चाहिए। खैर ये तो रही हमारे पड़ोसी की बात, अब उन्हे जाने देते हैं, अभी सो रहे हैं। खामख्वाह कहेंगे कि इसे रात को भी चैन नहीं है, दिनभर तो अपनी छत पर टंगा रहकर मेरी नाजुक-फूल-सी बेटियों पर नजरें डालता रहता है। अब आप ही बताएं कि लेखन करने के लिये छत से बेहतर जगह क्या हो सकती है जो प्रकृति के अप्रतिम उदाहरण आसमान के नीचे बसी रहती है। और रही बात कि नजरें डालने की तो नजरें हम डालते नहीं, हमारे लिये जो उपयुक्त व हमारे बजट में होता है, ईश्वरीय कृपा से सामने आ ही जाता है, उसके लिये हम अधिक दौड़-भाग नहीं करते। कृष्ण ने इस विषय पर बहुत उदाहरण प्रस्तुत किये, लेकिन ज्ञान होते ही, सब छोड़-छाड़ कर चले गएअपने जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति करने। ङमारी भी कुछ वैसा ही है, मुड़कर भी न देखेंगे, मनमोहर-से-मनमोहर सौन्दर्य भी उसे प्रभावित नहीं कर पाता, जिसे हृदय में उस शून्य के पाने की अग्नि जल उठे। यह तो रही पीछे की बात, कभी समझ ही लेंगे, ऐसा कदापि न होगा कि टाल देंगे।

बात आर्थिक समस्याओं की थी, हमें तो इस बारे में समस्याएं हैं, लेकिन हम कोशिश करते हैं कि दिन-भर उन्हें सिर पर लेकर घूमता न रहा जाए, वो अधिक कष्ट देगा। हृदय की छिपी बात बताएं तो हमने ब्लॉगिंग यही सुनकर शुरु की, कि धनं वर्षा भवति, कोई कहता था कि कुबेर स्वयं तुम्हारी स्क्रीन में बस जाएंगे। लेकिन पूरा एक बरस इसी ख्याल में निकल गया कि अब, या अब आएगी वो घड़ी जब मनोहरी वर्षा को अंजाम देने वाले बादलों की भीड़ हमारी इस डिजिटल छत पर होगी। पर अब लगता है वह सावन तो किसी से पहले ही समझौता करके बैठा है कि ‘अब के बरस मैं तेरे यहाँ।’
हमारे सिर के ऊपर अपनी रोशनी फैला रहे, चंदा मामा भी अब हमें कह रहे हैं कि ‘अब सो जाओ भांजे।’ तो अब अधिक न कहते बुए, कुछ इन्हीं बातों के साथ आज की रात मैं आपसे विदा लूंगा, अपना और सबका ख्याल रखें।

और, हाँ, धन्यवाद आप सभी का।🙏

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