‘जब शैतान साधू होना चाहता है…’- लेख/निबंध/विचार

The devil was sick, the devil a monk would be..
Photo by Vijendra Singh on Unsplash

अज्ञेय जी का उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ पढ़ते समय पुस्तक के अंतिम भागों में उन्होंने Francois Rabel की कुछ पंक्तियों का उल्लेख किया था जो निम्न हैं-

The devil was sick, the devil a monk would be;
The devil was well, the devil a monk was he.

-Francois Rabel

यानि जब शैतान बीमार हुआ, तब उसने साधू होना चाहा। और जब वही शैतान साधू बनकर स्वस्थ व नवीन हो गया, तब वह फिर से शैतान हो गया।
वह शैतान एक बार फिर जब स्वयं को निस्तेज व मरणासन्न अनुभव करेगा, तो फिर से साधुता की एक छोटी-सी यात्रा पर निकल जाएगा। और ऐसे ही उसके साधुता और शैतानियत में विचरने का क्रम निरंतर चलता रहेगा।

और हम लोग या मैं भी ऐसे ही हैं, जब भी हम किसी बीमारी या समस्या में फँस जाते हैं, तो विभिन्न परहेजों और भगवान की प्रार्थना से अपने सोये मन को जगाकर ऐसी साधुता दर्शाते हैं कि मानो बीमारी या समस्या समाप्त, खत्म हो जाने के बाद भी ये साधुता बनी रहेगी।

इसी बात को किसी मिलते हुए अर्थ में कबीर साहब जी ने कहा हैं-
दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय ॥

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10 comments

  1. Woww
    इंसान होता सदा स्वार्थी
    पल में बदलता रूप यहा
    कभी धरा भगवान बने तो
    कभी बनता शैतान यहा।।

    वक़्तानुसार बदलता रूप वो
    जैसा जिसका वक़्त यहा
    कभी कभी तो डरे भगवान भी
    प्राणी अधबुद्ध इंसान बना यहा।।

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